सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

धर्म हठ

मैंने भी बादल की 
एक बूँद  के
इन्तजार में;
बिताया है
पूरा एक बरस !


फिर मन मार कर
धरती की छाती में 
धँसा दिया 
नुकीला हल !

क्योंकि 

मुझे तो निभाना ही था,
एक किसान का धर्म ;

भले ही
नष्ट हो जाय 
एक और सभ्यता 
अपने विकास के 
चरमोत्कर्ष 
परिणामों से !

टिप्पणियाँ

  1. मुझे तो निभाना ही था,
    एक किसान का धर्म ;

    बहुत सुंदर भाव ,,,

    RECENT POST : पाँच( दोहे )

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (02.09.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें .

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर अभिव्यक्ति .खुबसूरत रचना ,कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  4. मैंने तो निभाना है धर्म ...
    ऐसे लोगों के भार पर ही पृथ्वी टिकी रहती है ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. मुझे तो निभाना ही था,
    एक किसान का धर्म ;
    काश ! हर कोई अपने धर्म और अपने कर्म को समझे

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "