शनिवार, 22 मार्च 2014

झूठी अभिलाषा

अतृप्त मन की
अतृप्त जिज्ञासा,
शान्त क्षणों का
उद्विग्न कुहासा।


तुम्हारा आना
सुखद था पर,
जाना तुम्हारा
दुखद क्यों है?
शायद मन को
अभी तुम्हारे
आने की है आशा।


जब चले ही गए हो,
फिर रह रह कर
क्यों आने की
आहट भर देते हो।
कितना दूँ अब
मेरे दिल को
झूठा सा दिलासा।


यह पथ भी कितना
कठिन है और
क्रूर नियति की
क्या यही गति है,
करना है पूर्ण यह
जीवन पथ
लिए साथ एक
झूठी अभिलाषा।


अतृप्त मन की
अतृप्त जिज्ञासा,
शान्त क्षणों का
उद्विग्न कुहासा।

4 टिप्‍पणियां:

  1. झूठी ही सही .. कभी कभी ये अभिलाषा जरूरी हो जाती है जीने के लिए ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. जब चले ही गए हो,
    फिर रह रह कर
    क्यों आने की
    आहट भर देते हो।
    कितना दूँ अब
    मेरे दिल को
    झूठा सा दिलासा।
    जीने के लिए कुछ तो बहाना जरुरी है

    उत्तर देंहटाएं

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