बुधवार, 21 मई 2014

आधी रात का आधा शहर

रात के साये में
फुटपाथों पर पसरा
आधी रात का
आधा शहर !

ठेले, खुमचे वाले,
रिक्शे, चाय वाले,
काम की तलाश में
आये बेरोजगार !
मजबूर मजदूर
और उनका परिवार
सब को मखमली फुटपाथ,
सुला लेता है
अपनी गोद में
एक माँ के जैसा।
और सुबह होते ही
दौड़ पड़ेगा फिर से
पूरा शहर  ;

पर कई पिछली रातों सा
कल रात भी
दिख जाएगा
इन्हीं फुटपाथों पर
आधी रात के बाद
आधा शहर !

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (22-05-2014) को अच्छे दिन (चर्चा-1620) पर भी है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. फुटपाथ होता है पूरा शहर ... सब कुछ तो होता है इस्सी फुटपाथ पर ...
    गहरी छाप छोड़ती रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. मन को छूती कविता आपकी ,सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  4. कितने लोगों को आसरा देता है ये फुटपाथ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. हकीकत बयान की है आपने, मंगलकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. पर कई पिछली रातों सा
    कल रात भी
    दिख जाएगा
    इन्हीं फुटपाथों पर
    आधी रात के बाद
    आधा शहर !
    आधे शहर की यही कहानी है ! बहुत सुन्दर लिखा है आपने श्री वाणभट्ट जी

    उत्तर देंहटाएं

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