मंगलवार, 19 मई 2015

अंतिम कविता का पहला अंश

ओह !
इन चमकते रेत के दानों में 
आज भी हमारे साथ बिताये 
पलों की चमक वैसी ही है ।

और 
जेहन में उन ठहरे हुये लम्हों की
यादें बिल्कुल वैसी ही ताजी हैं
जैसे अभी खिली हुयी गुलाब की कली ।


आह ! 
कितना सुखद था ये बीता हुआ ख्वाब;
जिसमें पल भर के लिये
तुम मेरे पास आये तो सही ।




क्यों 
मैं देख रहा हूँ खुली आखों से 
अब भी तुम्हारा ही ख्वाब ।
कि जैसे तुम गये ही नहीं हो कहीं।


हाँ 
मैं फिर कहता हूँ 
कि मैं नहीं कह सकता 
उन शब्दों को जो 
तुम सुनना चाहते हो ।



बस 
तुम पढ़ लो मेरे खामोश 
लबों पर थिरकते हुये 
वो अपने प्रिय शब्द ।




2 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना.... वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह

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  2. बहुत ही उम्दा रचना


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