शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

सीढ़ी और कंधे

आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी 
किसी के कंधे पर से 
होकर ही गुजरती है।

जैसे आगे बढ़ रहा 
मार्क्सवाद के कंधों पर चढ़कर पूँजीवाद;

जैसे बढ़ा था कभी
बंधुवा मजदूर के कंधों पर चढ़कर जमींदार।

ठीक वैसे बढ़ रही है
जनता के कंधों पर चढ़कर सरकार।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज रविवार (22-01-2017) को "क्या हम सब कुछ बांटेंगे" (चर्चा अंक-2583) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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