शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

रात गुज़र जाएगी

मेहरबानियां उनकी इसकदर हैं मुझपर,
गिनने बैठूंगा तो रात गुज़र जाएगी !

रहने दो ख़ामोश लबों को,
असर होने दो दुवाओं का;
जख्म की नुमाइश में बात गुज़र जाएगी !

सितमगर तेरा हरेक सितम,
मेहरबानी से बढ़कर है मेरे लिए;
ठहर गया जो लम्हा, सौगात गुज़र जाएगी!

तड़प उठता है ज़िगर इक याद पे,
सब्र कर लेता हूँ ये सोंचकर;
छूली जो तस्वीर तेरी, ऐतिहात गुज़र जाएगी!

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-02-2017) को
    "हँसते हुए पलों को रक्खो सँभाल कर" (चर्चा अंक-2592)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 13 फरवरी 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. ज़ख्मों की नुमाइश में बात गुजर जाएगी ..क्या बात है .

    उत्तर देंहटाएं
  4. सितमगर तेरा हरेक सितम,
    मेहरबानी से बढ़कर है मेरे लिए;
    ठहर गया जो लम्हा, सौगात गुज़र जाएगी!
    वाह....
    बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं

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