सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लक्ष्य निर्वाण !

चलते-चलते यदि 
रुक जाये पथिक 
तो लक्ष्य हो जाता 
क्यों और कठिन ?

पर गति ही तो है 
जो चेतन को देती 
नया अस्तित्त्व ,
और बनाती जीवंत !

लक्ष्य पूर्व ठहराव 
करता व्योमोहित 
और अंतस को 
कर देता भ्रमित !

बाधाएं और विराम ,
नहीं है लक्ष्य के 
कोई तुष्टि हेतु विकल्प !
और परिणाम !

चेतना ही चेतन को 
देगी इसका पूर्ण 
और शाश्वत लक्ष्य 
व अंतिम विराम !


हे अत्न होकर 
व्यथित और श्रांत 
न कर जीवन 
व्यर्थ और क्लांत !

तज न यह पथ
होकर कर्मच्युत
व्यर्थ न कर
लक्ष्य निर्वाण !

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?