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ये शब्द नहीं, यथार्थ हैं वर्तमान का और प्रत्यक्ष भविष्य !

क्षुधाकुल बालक की
कंठ अवरुद्द सिसकियाँ,
रोटी की जद्दोजहद में
टूटे हुए बदन का दर्द !
बंजर हुयी धरती की
अन्न्दायी वह कोख !
क्या यही है
मानव की महानतम
सभ्यता का चरम विकास !!


सूख गये बादल
सूरज शीतल हो गया ,
चाँद की तपिश
अब चुभने लगी बदन में !
नदी के चिह्न हैं
मात्र अवशेष ,
मौन हो चली जलधारा !!

हवा बंद है
एक सिलेंडर में
सांसें अब बिकने लगीं !
खरीदने को है
बेचैन अतिगव मानव ;
शायद भूल गया
वह प्रारब्ध के नियमों को !!

विकास की भूख ने
निगल लिया है
साधनों को;  अब
प्रायश्चित ही  शेष है
मिटाने को भूख,
 एवं प्रतीक्षा
 एक और सभ्यता के
 पतन की !!

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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?