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असत्य, अस्तित्त्व सत्य का




 असत्य
जिसने बदला इतिहास,
जिसके  होने पर होता है 
सत्य का परिहास!

असत्य,
 रखते हुए अस्तित्त्व,
करता सत्य को साकार;
सत्य का जब हुआ उपहास,
असत्य से ही मिला प्रभास!

किचित
असत्य नहीं  होता यथार्थ!  
परन्तुसत्य के महत्त्व का 
आधार है यही असत्य,

हम अब भी सत्य  
असत्य  के महत्त्व के मध्य,
हैं  विभ्रमित और विस्मित !

इस पार है असत्य ,
उस पार वह प्रत्यक्ष ,
सत्य !!

टिप्पणियाँ

  1. इस पार है असत्य,
    उस पार वह प्रत्यक्ष,,,भाव पूर्ण पंक्तियाँ

    यही है जीवन का सत्य,,,,

    RECENT POST:..........सागर

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  2. हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया....
    सशक्त और सार्थक भाव..

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  4. सत्य और असत्य के बीच बिभ्रम कि झीनी चादर को हटाने का एक सार्थक प्रयास ...आपको सत्य सर्जन के लिए बधाई ..बहुत दिनों बाद एक अच्छी कविता पढने को मिली आपको पुन: बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. सत्य और असत्य के बीच बिभ्रम कि झीनी चादर को हटाने का एक सार्थक प्रयास ...आपको सत्य सर्जन के लिए बधाई ..बहुत दिनों बाद एक अच्छी कविता पढने को मिली आपको पुन: बधाई

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  6. बहुत सही लिखा है |सत्य और असत्य के बीच विभ्रमित,
    आशा

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "