बुधवार, 12 नवंबर 2014

हार क्यों मानूं अभी से

जिन्दगी
कोई बिना जिन्दगी के
गुजरती नहीं,

सांसें दौड़ 
रहीं हैं
समय को हराने के लिए।
भले ही हार जायेंगी
एक दिन ।

तब तक
हार मान कर
खुद ही टूटने वाली नहीं हैं।
फिर भला मैं
ये कैसे मान लूँ
कि हार चुका हूँ!

जब तक
हारा नहीं हूँ,
जीत की उम्मीद पर
जी तो सकता हूँ,
जी भर कर ।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसूरत पंक्तियाँ |बैसे यह भी कहा जाता है कि जो हारता है वही जीत का आनंद उठा पाताहै |

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  2. सच कहा है .... हारा हुआ इंसान तो जी नहीं पाता ... उम्मीद है जो जीने को प्रेरित करती है ...

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