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इन्तिहा

गम के सिलसिले थमते कहाँ हैं;
न जाने तुम कहाँ हो, हम कहाँ हैं।

वक्त रोज़ गुजार देता है हमको;
सदियों से लम्हे गुजरते कहाँ हैं।

अक्सर गूँजती हैं सन्नाटों में तन्हाइयाँ;
वीरान दोनों के ही अपने जहाँ हैं।

हर शाम गुजरती है गमगीन होकर;
महफिलों में भी हम रहते तन्हा हैं।

गम के सिलसिले थमते कहाँ हैं;
न जाने तुम कहाँ हो, हम कहाँ हैं।





 

टिप्पणियाँ

  1. वक्त रोज़ गुजार देता है हमको;
    सदियों से लम्हे गुजरते कहाँ हैं।..
    बहुत लाजवाब शेर है इस यथार्थ परक ग़ज़ल का ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (15-12-2014) को "कोहरे की खुशबू में उसकी भी खुशबू" (चर्चा-1828) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  3. वक्त रोज़ गुजार देता है हमको;
    सदियों से लम्हे गुजरते कहाँ हैं।
    अच्छी रचना ,इन्तिहा ये लफ्ज ही मुहं से निकलते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर.
    क्या बात लिखी है आपने
    "महफिलों में भी हम रहते तन्हा हैं।"

    पढ़कर अच्छा लगा.

    हिंदी प्रेरणाप्रद कहानियाँ और आलेख

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "