शनिवार, 28 अप्रैल 2012

मैं टूटता चला गया!

तुमने मुझे जो तोहफा-ए-गम दिए,
हिफाजत में इनकी , मैं टूटता चला गया!

मंजिले बहुत थीं इस जमाने में मगर
हर एक मंजिल में , तुझे ढूंढता चला गया !

रात में पहले नींद फिर नींद  में ख्वाब  
और  ख्वाबों में तुझको ही  ढूंढता चला गया!

रह गया एक तू ही ख्यालों में अब ,
जहाँ के साथ खुद को ही भूलता चला गया !

आँख को या अश्कों को कहूं बेवफा,
ये सवाल जिन्दगी से पूंछता चला गया !

तुमने मुझे जो तोहफा-ए-गम दिए,
हिफाजत में इनकी , मैं टूटता चला गया! 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कीमत

तुम आ गए हो तो रौनक आ गई है गरीबखाने  में वगरना कोई कब्रिस्तां में जश्न मनाता है क्या। एक इश्क ही तो है जिसमें लोग लुट जाते हैं, यूं ह...