रविवार, 22 अप्रैल 2012

शायक और समाज

शायक !
तुमने तो जीने का ढंग,
ढूढ़ लिया शब्दों में !

मगर 
आम आदमी का 
यूं साँस लेना मुनासिब नहीं ;

यही शब्द,
जो तुम्हें जीवन देते हैं;
उसके लिए भ्रम जाल से कम नहीं !

शायद 
यही अंतर है आम आदमी
और  शायक के शब्द अभिव्यक्ति में !

जीवन 
बन जाता है सरल और दुस्तर 
इन्हीं अर्थों की बीथिका में उलझकर !

शब्दों के
अर्थ को पा लेना फिर
उन्हें अंगीकार करना ही सार्थक 
बनाता है शायक का स्पस्ट प्रयोग !

1 टिप्पणी:

  1. जीवन
    बन जाता है सरल और दुस्तर
    इन्हीं अर्थों की बीथिका में उलझकर!........
    उलझ गई मैं.....
    मुझे समझने में वक्त लगेगा इस कविता को

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