शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

थकन

मेरी तल्खियाँ इतनी नागवार तो नहीं कि,
तुझे मेरी सूरत से भी चुभन होने लगी 

मैं तो जिन्दा हूँ तुझे अपना भर मानकर,
तेरे बिन सांसों को भी घुटन होने लगी 

काश बुझ गयी होती ये तमन्ना-ए-दिल,
हर इक आरज़ू को भी जलन होने लगी  ।

गजल कोई उपजे तो भला किस कदर,
जब लफ्ज-लफ्ज को भी थकन होने लगी  ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...
    गजल कोई उपजे तो भला किस कदर,
    जब लफ्ज-लफ्ज को भी थकन होने लगी ।
    बढ़िया ग़ज़ल..
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह लाजवाब ह्सेर हैं सभी ... और आखरी वाला तो सुभान अल्ला ..

    उत्तर देंहटाएं

चुनाव और प्रजातंत्र

भारत को आजाद हुए 70 साल पूरे हो गए और 70 सालों से यहां पर लोकतंत्र बहाल है। कहने को और संवैधानिक रूप से इस देश में प्रत्येक नागरिक स्वतंत्र...