शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

छीनने की कला

चिड़ियों ने
छोड़ दिया है,
अपने चूज़ों को चुगाना,
अब वो सिखाती है
चोंच मारकर
दूसरों के दानों को
छीनने की कला।


आज के दौर में
ठीक वैसे ही जरूरी हो गई है,
छीनने की प्रवृत्ति
जैसे है जरूरी जीना।

अब लोगों ने
धूप में अनाज
सुखाना बन्द कर दिया है,
और खेत खलिहानों में भी
छूटे हुए दानों पर भी
होने लगी है कालाबाजारी,
और छीनने की कला
अब अपराध नहीं,
हो गई है पूर्ण न्यायिक और नितान्त ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. छूटे हुए दानों पर भी
    होने लगी है कालाबाजारी,
    और छीनने की कला
    अब अपराध नहीं,

    वाह ! सुंदर अभिव्यक्ति...!

    RECENT POST - आँसुओं की कीमत.

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  2. अब यही कला बची है !! मंगलकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रभावी ... प्राकृति सभी में बदलाव लाने लगी है .. इंसान का मुकाबला करने को ...

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  4. यही सब तो हो रहा है ,आदमी की फ़ितरत बदलती जा रही है .

    उत्तर देंहटाएं
  5. .बहुत सार्थक सोच...एक एक पंक्ति गहन अहसासों से परिपूर्ण और दिल को छू जाती है

    आग्रह है-- हमारे ब्लॉग पर भी पधारे
    शब्दों की मुस्कुराहट पर ...खुशकिस्मत हूँ मैं एक मुलाकात मृदुला प्रधान जी से

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज के दौर में
    ठीक वैसे ही जरूरी हो गई है,
    छीनने की प्रवृत्ति
    जैसे है जरूरी जीना।
    जरुरी भी है इस कला में पारंगत होना क्योंकि सच और ईमानदारी की कोई कद्र नहीं करता ! हक़ आजकल मांगने से नहीं हथियाने से , छीनने से ही तो मिलता है ! सटीक शब्द

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