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छीनने की कला

चिड़ियों ने
छोड़ दिया है,
अपने चूज़ों को चुगाना,
अब वो सिखाती है
चोंच मारकर
दूसरों के दानों को
छीनने की कला।


आज के दौर में
ठीक वैसे ही जरूरी हो गई है,
छीनने की प्रवृत्ति
जैसे है जरूरी जीना।

अब लोगों ने
धूप में अनाज
सुखाना बन्द कर दिया है,
और खेत खलिहानों में भी
छूटे हुए दानों पर भी
होने लगी है कालाबाजारी,
और छीनने की कला
अब अपराध नहीं,
हो गई है पूर्ण न्यायिक और नितान्त ।

टिप्पणियाँ

  1. छूटे हुए दानों पर भी
    होने लगी है कालाबाजारी,
    और छीनने की कला
    अब अपराध नहीं,

    वाह ! सुंदर अभिव्यक्ति...!

    RECENT POST - आँसुओं की कीमत.

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब यही कला बची है !! मंगलकामनाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रभावी ... प्राकृति सभी में बदलाव लाने लगी है .. इंसान का मुकाबला करने को ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. यही सब तो हो रहा है ,आदमी की फ़ितरत बदलती जा रही है .

    उत्तर देंहटाएं
  5. .बहुत सार्थक सोच...एक एक पंक्ति गहन अहसासों से परिपूर्ण और दिल को छू जाती है

    आग्रह है-- हमारे ब्लॉग पर भी पधारे
    शब्दों की मुस्कुराहट पर ...खुशकिस्मत हूँ मैं एक मुलाकात मृदुला प्रधान जी से

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज के दौर में
    ठीक वैसे ही जरूरी हो गई है,
    छीनने की प्रवृत्ति
    जैसे है जरूरी जीना।
    जरुरी भी है इस कला में पारंगत होना क्योंकि सच और ईमानदारी की कोई कद्र नहीं करता ! हक़ आजकल मांगने से नहीं हथियाने से , छीनने से ही तो मिलता है ! सटीक शब्द

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "