शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

"आंगन में धूप खिली है "


बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

फैला था कुहरा 
अति घनघोर ,था चतुर्दिश 
शीत लहर का शोर ,
कुहासे के छटने पर ,
सूरज ने ऑंखें खोली है ....
बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/


शिशिर रातों के 
हिम पाटों में 
शीत से व्याकुल हो 
तप-तप टपकती 
जल की बूंदों से 
निशा में आकुल हो हमसे आज करती 
प्रकृति भी यूँ कुछ 
ठिठोली है............

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

देख कर जलद
उड़ते गगन में
आम्र कुंजों में मग्न हो,
नाच उठे मयूरी /
सितारों जड़ी ओधनी 
ओढ़ के धरा पर 
आयी  हो शाम सिंदूरी 
मानो शृंगारित  हो 
नव वधू प्रिय मिलन को चली है.........

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

पौधों पर नव कलियाँ 
खिल-खिल कर झूम रही ,
सरसों की अमराई में
तितलियाँ फूलों को चूम रही 
मानो प्रकृति ने आज धरा पर 
पीली चूनर डाली है ..........

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

नभ में गूँज रहा
विहगों का कलरव 
खिला हुवा अम्बुज है 
ज्यूं सरिता का कुल गौरव 
निज योवन कि अंगड़ाई  में
निस्त्रा भी मचली है.............

बहुत दिनों के बाद ,
आज मेरे भी आंगन में 
धूप खिली है/

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