सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वख्त ( भाग्य )

हश्र कुछ यूँ हुआ जिन्दगी की किताब का ,
मैं जिल्द संवारता रहा और पन्ने बिखरते गये !

जिश्म में बाकी रही जान  भर  खालिस और,
रूह के हर वो कतरे पल-पल तडपते गये !

नुमाइश क्या करता मैं जख्मों का जहाँ में,
हर वो इरादतन- हादसे तजुर्बों में ढलते गये !

कोई मौला न मिला मेरी दुआओं को 
ख़्वाब-दर-ख्वाब आँखों से बिछड़ते गये !

मुझे मंजिल मिलने  का गम नहीं यारों,
थक गयी जिन्दगी और रास्ते बदलते गये !

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।