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इस पत्थर के शहर में


इस पत्थर के शहर में 
तुम कैसे रह पाओगे !

यहाँ का शोर अन्नत के 
सन्नाटे में विलीन हो जाता है 
तुम्हारी चीखों को कौन सुनेगा ?
कुछ भी बोलोगे तो तुम भी 
पत्थर के हो जाओगे 
इस पत्थर के शहर में 
तुम कैसे रह पाओगे !

यहाँ दिल वाले तो हैं 
पर दिल की बीमारी को ढोते हैं 
रातों में वो जगते हैं 
दिन के उजाले में सोते हैं 
इनसे नाता जोड़ोगे तो 
तुम भी तुम से  खो जाओगे
इस पत्थर के शहर में 
तुम कैसे रह पाओगे !

हर गलियों में लाशें बिछी हैं 
हर राहों पर आहों ने दम तोडा है 
रोटी की खातिर सब ने यहाँ 
अपने अरमानो को छोड़ा है 
इन राहों पर कैसे तुम चल पाओगे 
इस पत्थर के शहर में 
तुम कैसे रह पाओगे !

टिप्पणियाँ

  1. बहुत खूब.....ये तो पत्थरों का शहर है.....

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  2. pathar dil hote insaanon ke beech rahna sach bahut dushkar hai..
    sach shahar ki aao-hawa kabhi kabhi badi vedanmayee ho jaati hain..
    bahut sudnar marmsparshi rachna..

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
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सबंधों की गठरी
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बना रहे
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तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।