सोमवार, 30 जुलाई 2012

जिन्दगी



जिन्दगी भर जीता रहा जिन्दगी;
फिर भी समझ न आयी जिन्दगी !

मेरे अरमानों को लोग दफनाते गये;
नये-नये रास्ते चलने को बतलाते गये;
रोज नया मोड़ लाती गयी जिन्दगी !

यूँ तो जख्मी सारा जहाँ ही था,
जीने को जमीं न आसमाँ ही था;
फिर भी चलती ही जा रही जिन्दगी!

कभी एक पहेली- कभी एक सवाल है 
     फलसफा कभी, दर्शन तो कभी वबाल है!
सबको उलझाती जा रही है जिन्दगी ! 


जिन्दगी भर जीता रहा जिन्दगी;
फिर भी समझ न आयी जिन्दगी !


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