बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

कार्ल गर्ल !


जिश्म को
जिन्दा रखने के लिए 
गुजारनी पडती हैं 
उसे रातें "unfamiliar " 
जिश्मों के साथ !
कि जिन्दा रख सके 
कुछ रिश्ते जो
या तो जन्म से मिले 
या थोप दिए हैं 
समाज ने उस पर !
और वह मजबूर है
जीने के लिए
इसी समाज में बनकर 
कार्ल गर्ल !



40  का बीमार -अपाहिज पति 
68 की बूढी मां
और 7  वर्ष की बच्ची 
वह  स्वयं 27  बसंत देखे हुए 
अभिशापित सुंदर !
इन सब को जिन्दा रखने के लिए 
समाज ने मजबूर किया 
उसे कार्लगर्ल
बनने को  !

ऑफिस का एम् डी
और पूरा मेल स्टाफ,
सबको बस  एक ही चाह!
फिर क्यों वह 
यहसब सहती 
उसने कर लिया निर्णय 
अब वह नही करेगी सहन 
और समाज की अवधारणा को 
कर दरनिकार 
बनाएगी इसको
जीने का साधन !


यह कोई शौक नहीं है
और न ही कोई 
बनना चाहेगी कार्ल गर्ल !
पर जब हर पुरुष ने 
उसके जिश्म की 
तरफ ही देखा और
नोचना चाहा !
फिर वह किस धर्म 
और पाप का चिंतन करती !

कम से कम 
आज उसकी मां,
पति और बच्ची 
जीवित तो हैं !
भले ही "स्त्री "
मर गयी हो ;
इसमें क्या दोष है इस "स्त्री" का
यह तो समाज की ही अवधारणा है
जिसने न जाने कितनी ही 
लड़कियों को
या तो मजबूर कर देता है
या जबरन बना देता है
कार्ल गर्ल !! 


( एक ऐसी ही स्त्री जिसकी व्यथा सुनकर मैं कुछ न कर सका
सिवाय उसकी विवशता से  आप को अवगत  कराने के ! 
In the train journey to Odisha on 4th Feb- 2013)

8 टिप्‍पणियां:

  1. अत्‍यन्‍त सुन्‍दर अनुभूति अस्‍थाना बॉस।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अस्थाना जी ...अपना समाज इस दोहरी मानसिकता का ही शिकार है
    आपकी इस कविता,इस सोच के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है कहने को

    उत्तर देंहटाएं
  3. ऐसी अभिशापित स्त्री के लिए हम सब सारा समाज जिम्मेदार है,,,,

    RECENT POST: रिश्वत लिए वगैर...

    उत्तर देंहटाएं
  4. कम से कम
    आज उसकी मां,
    पति और बच्ची
    जीवित तो हैं !
    भले ही "स्त्री "
    मर गयी हो ;------marmik

    उत्तर देंहटाएं

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