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अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !


क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर  ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !


रहबर ने गर्दिश-ए- खाकसार बना दिया,
जैसे तूफां के झोकों से दरख्त बर्बाद हुए है !

हर वक्त जो भी वख्त में मिला वो सब,
गम-ए- फुरकत में मेरे ही इन्दाद हुए हैं !


चश्म-ए-दीदार की जादूगिरी को क्या कहें,
शेख और सूफी भी न इनसे आजाद हुए है !


उजड़े ही हैं चमन यहाँ इश्क-ए-राह पर,
कहाँ - कब घरौंदें घास के आबाद हुए हैं !


क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !

टिप्पणियाँ

  1. उत्कृष्ट गजलें। हर गजल के भीतर नवीन कल्पना और नवीन संदर्भ। गर्दिश से खाकसार बनना मानो तुफानों से दरख्तों का बर्बाद होना बेहतरीन।

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  2. चश्म-ए-दीदार की जादूगिरी को क्या कहें,
    शेख और सूफी भी न इनसे आजाद हुए है !

    बिलकुल सच.

    उत्तर देंहटाएं
  3. चश्म-ए-दीदार की जादूगिरी को क्या कहें,
    शेख और सूफी भी न इनसे आजाद हुए है ..

    वाह क्या बात है ... इस जादोगरी से बचना मुश्किल है ..

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "