बुधवार, 10 अप्रैल 2013

अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !


क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर  ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !


रहबर ने गर्दिश-ए- खाकसार बना दिया,
जैसे तूफां के झोकों से दरख्त बर्बाद हुए है !

हर वक्त जो भी वख्त में मिला वो सब,
गम-ए- फुरकत में मेरे ही इन्दाद हुए हैं !


चश्म-ए-दीदार की जादूगिरी को क्या कहें,
शेख और सूफी भी न इनसे आजाद हुए है !


उजड़े ही हैं चमन यहाँ इश्क-ए-राह पर,
कहाँ - कब घरौंदें घास के आबाद हुए हैं !


क्योँ ना सजा लूँ ग़म ए हस्ती अब्तर ,
जो अशआर मे अश्क-ए-गम इजाद हुए हैं !

10 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट गजलें। हर गजल के भीतर नवीन कल्पना और नवीन संदर्भ। गर्दिश से खाकसार बनना मानो तुफानों से दरख्तों का बर्बाद होना बेहतरीन।

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  2. चश्म-ए-दीदार की जादूगिरी को क्या कहें,
    शेख और सूफी भी न इनसे आजाद हुए है !

    बिलकुल सच.

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  3. चश्म-ए-दीदार की जादूगिरी को क्या कहें,
    शेख और सूफी भी न इनसे आजाद हुए है ..

    वाह क्या बात है ... इस जादोगरी से बचना मुश्किल है ..

    उत्तर देंहटाएं

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