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गर तू खुद को नींद से जगा दे !


कतरा- कतरा जिन्दगी जीने से बेहतर है 
एक पल मुस्कराते हुए  जाँ लुटा दे !

मिल जायेगी ये शोहरत भी धूल में,
बेहतर है खुद को वतन पे मिटा दे ! 

शर्म से झुकना सर का, जिल्लत है,
क्यों न मादरे-वतन पे कटा दे !

सभी राहों से पाकीज़ा है कुर्बानियों की,
अपना भी कदम एक बढ़ा दे !

बन जाएगी तेरी हस्ती भी यहाँ,
गर तू खुद को नींद से जगा दे !

कतरा- कतरा जिन्दगी जीने से बेहतर है 
एक पल मुस्कराते हुए  जाँ लुटा दे !

टिप्पणियाँ

  1. देशभक्ति और स्वाभिमान से जीने मार्ग अपनाने का आवाहन करने वाली कविता।

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  2. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 20/04/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  3. सभी राहों से पाकीज़ा है कुर्बानियों की,
    अपना भी कदम एक बढ़ा दे ...
    देश पे कुर्नाब होने वाले कम हैं आज ... बस दोहन करना चाहते हैं देश का ...
    अच्छे शेरों के माध्यम से मन की बात कही है ...

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  4. सभी राहों से पाकीज़ा है कुर्बानियों की,
    अपना भी कदम एक बढ़ा दे !

    बहुत उम्दा
    latest post"मेरे विचार मेरी अनुभूति " ब्लॉग की वर्षगांठ

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  6. देश-भक्ति से ओत-प्रोत कर गई आपकी रचना
    हार्दिक शुभकामनायें ....

    उत्तर देंहटाएं
  7. देशभक्ति का अहसास जगाती सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर व प्रेरणा दायक विचार ... बहुत खूब!

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी यह अद्वितीय प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है। कृपया अवलोकन करें। आपकी प्रतिक्रिया एवं सुझाव सादर आमन्त्रित है।

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  10. काश,सभी के अंतर में इसकी प्रतिध्वनियाँ जाग जाएँ !

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुंदर और देश-प्रेम से ओत-प्रोत रचना ....बहुत आनंद आया . ऐसे विचरों की आज सबसे ज्यादा जरूरत है

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।