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आह्वान

हर वो जंजीर
जो जकड़े हुए है
तुम्हें दासता
या विवशता में,
तोड़ना होगा।


और हाँ
अपनी कोमलता
और सहृदयता को
अब आयुध में
बदलना होगा।।


पर ध्यान रहे
तुम्हारा दायित्व
सृजन का है,
कहीं यह रौद्रता
प्रलयंकर न बन जाए।।

टिप्पणियाँ

  1. नव-सृजन के विकास हेतु स्नेहिल कोमलता चाहिये ,जो निरापद, निश्चिंत स्थिति में संभव है -कोई भी सृजन हो शान्ति और संरक्षण में समुचित पोषिण पाता है , संघर्षण और आयुध धारने की विवशता में रौद्र और भीषणता से कैसे बचेगा कोई ?

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  2. रौद्र होकर संयम न खोना बड़ा जटिल काम है....
    अच्छी रचना..

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. आह्वान है ये कविता .. उत्प्रेरित करते भाव ..

    उत्तर देंहटाएं
  4. पर ध्यान रहे
    तुम्हारा दायित्व
    सृजन का है,
    कहीं यह रौद्रता
    प्रलयंकर न बन जाए।।
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "