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संदेश

तेरे कूचे से हम जो गुज़रे

तेरे कूचे से हम जो गुज़रे, ज़माना फिर से गुज़र गया। इक सूखा सा दरख्त कोई, हरा हो फिर से शज़र गया। कोई लम्हा टिक कर रहता नहीं, सन्नाटा सदियों का पसर गया। तीरगी क्या थी जुम्बिशों की जिसमें डूब ही समंदर गया ।

जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी

जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी, दुःख-सुख के लम्हों से संवरती चली गयी। जैसे ही हुआ पैदा, रिश्तों ने बांध लिया, जोड़-तोड़ में जिंदगी बिखरती चली गयी। रोटी,पैसा और फिर अपनों की तलाश में राहे गुजर में यहाँ-वहाँ भटकती चली गयी। जिस दीवार के सर पे थी छत टिकी हुयी, क्यों वो नेह की दीवार दरकती चली गयी। जिंदगी कहाँ कहाँ से गुजरती चली गयी, दुःख-सुख के लम्हों से संवरती चली गयी।

हम हुए आजाद......., कि आज रोटी पकेगी।

हम हुए आज़ाद कि आज रोटी पकेगी, हुयी महंगी दाल कि तरकारी रंधेगी........ हम हुए आज़ाद.......... डंडे खाये -लाठी खायी और कुछ ने तो अपनी गरदन भी कटवायी, कि जशन पै आज मुला दारू बटेगी...... हम हुए आजाद........। सरकार बड़ी सरकारी है, जनता की तो लाचारी है। इस्कूल सबै गिर गए हैं मुला किताबें खूब बिकेंगी..... हम हुए आजाद.......। मरीज़ मरि रहे अस्पतालों में, डाकडर मस्त हैं भेड़चालों में मेडिसिन सब बिलैक् भईं, मुला दवाई खूब बनेंगी........ हम हुए आजाद......., कि आज रोटी पकेगी।

भढुवे

ये भढुवे हैं, रखते हैं स्त्री को वक्त की चाक पर; पर भूल जाते हैं, धुरी में रहने वाली स्त्री को । न चाहकर भी, स्त्री हो जाती है विवश कि बचा रहे स्त्रीत्व वक्त की चाक पर ।

चलता जा राही......

चलता जा राही साँसों के चलने तक, रुकना न कभी मंजिल के मिलने तक। चलता जा राही.......... जीवन क्या है बहती एक धारा है, जीता वही जो मन से कभी न हारा है। रात अभी कहाँ, सूरज के ढलने तक। चलता जा राही साँसों के चलने तक। सुख-दु:ख तो आने जाने हैं पल भर को ही खोने पाने हैं जलना ही जीवन है जलता जा तम के हरने तक, चलता जा राही साँसों के चलने तक।

भूख

शरीर के धारण करते ही पैदा हो जाती है भूख, जो मरने तक बनी रहती है । सारा जीवन इसी भूख के इर्द-गिर्द घूमता रहता है काल के पहिये की मानिन्द। भूख कभी नहीं मरती, मार देती है संवेदनाएं वेदनाएं और सीमाएं । हम भूख को जिन्दा रखने के लिये मारते रहते हैं जीवन को । भूख और जीवन दोनों ही नहीं मरते कभी । या भूख के मरने से पहले मर जाता है जीवन, कि जीवन के मरते ही मर जाती है भूख।

गुलामी की राह पर बढ़ते कदम

हम देशवासी सरकारों से उम्मीद करते हैं कि हमें स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन और सुरक्षा मिलेगी । पर मिलता क्या है? रोटियों के लिये स्त्रियों को लुटना पड़ता है, सुरक्षा करने वाले रक्षक मौका पाते ही नोच डालते हैं। रईस लोग अपनी शाम रंगीन करने के लिये कितनी ही पुत्रियों की जिन्दगियाँ नरक बना देते हैं । हर सरकार नई नई कागजी योजनायें बनाकर हमारे ही पैसों को डकार जाती हैं। हम दिन पर दिन कर्ज में डूब रहे हैं, सत्ता और विपक्ष मिलकर हमें लूटते रहते हैं , थोड़े व्यक्तिगत लाभ के लिये हम इन्हीं धूर्तों को सत्ता सौंप देते हैं और ये लोग हमें धर्म के नाम पर गुमराह करके अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम जानते हुये बार बार यही गलती करते हैं। हम गुलामी की ओर अग्रसर हैं और हमारी सन्तानें दासता का जीवन जीने के लिये मजबूर हो रहीं हैं । आइए इस गुलामी की तरफ कदम से कदम मिलाकर चलें, कहीं भविष्य का गौरवशाली इतिहास कलंकित न हो जाय कि हमारी पीढ़ी ने देश गुलाम बनाने में योगदान नहीं किया, या शायद इतिहास ही न लिखने लायक रहे यह देश ।