गुरुवार, 22 सितंबर 2011

"पुष्प की आत्मकथा "


प्रात ही मैं  
रवि रश्मियों से 
होकर आलोकित /
जीवन में मृदुल 
मुस्कान भरने हेतु ,
हुआ था मुकुलित/
नव चेतना लाने को
नव उमंग भरने हेतु ,
करने को मन पुलकित/


आशा थी 
जीवन के लघु पलों में ,
इतिहास रचूंगा /
बनूँगा मैं 
किसी के जीवन का आधार,
स्व को न निराश करूंगा/
जोडूंगा एक नया 
अध्याय ,
नव युग का विश्वास बनूँगा /


पर झंझा के 
तीक्ष्ण थपेड़ों ने 
अंग - प्रत्यंगों को कर दिया विदीर्ण /
आशा के प्रतिकूल 
रहा निराशमय जीवन 
तन मन हुआ छीर्ण 
व्यतीत हुए तीनों काल,
आलम्बन भी अब ,
हो चला जीर्ण /

भाग्य का अभीशाप कहूं 
या पूर्व जन्म का प्रायश्चित 
या तो हुआ न वनमाली को  गोचर ,
या राह गया मैं अवसर से वंचित /
बन सका न कृपा पात्र किसी का 
अटवि में पड़ा रह गया कदाचित 


कौतूहल से होकर भ्रांत,
प्रारब्ध को लब्ध मान,
जीवन कर्म को कर्तव्य जान 
निर्वाद से होकर भ्रांत ,
हेतु अस्तित्त्व की पहचान ,
कर रहा मैं जीवन दान /
यही है मानव तेरा भी जीवन 
मानवता हेतु , अब तू भी 
कर ले लक्ष्य संधान /


हे! अतिगव,
कृतान्त से अब न 
मुख मोड़
लक्ष्य प्राप्ति हेतु 
तू अब न 
कर्तव्य पथ छोड़,
कर कृतार्थ जीवन को 
निज प्राण को 
निर्वाण से जोड़/

5 टिप्‍पणियां:

  1. शब्द प्राचुर्य और समृद्ध भाव... सौन्दर्य के नए प्रतिमान गढ़ रहे हैं... सुन्दर सृजन! बधाई!!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. कर कृतार्त जीवन को
    निज प्राण को
    निर्वाण से जोड ।

    बहुत सुंदर प्रस्तुति ।

    उत्तर देंहटाएं

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