गुरुवार, 22 सितंबर 2011

सृजन




तोड़ दो सपनो की दीवारे,
मत रोको सृजन के चरण को ,
फैला दो विश्व के वितान पर,
मत टोको वर्जन के वरण को !


जाने कितनी आयेंगी मग में बाधाएँ,
कहीं तो इन बाधाओं का अंत होगा ही .
कौन सका है रोक राह प्रगति की ,
प्रात रश्मियों के स्वागत का यत्न होगा ही !

प्रलय के विलय से न हो भीत,
तृण- तृण  को सृजन से जुड़ने दो
नीड़ से निकले नभचर को
अभय अम्बर में उड़ने दो,

जला कर ज्योति पुंजों को ,
हटा दो तम के आवरण को ,

तोड़ दो सपनो की दीवारे,
मत रोको सृजन के चरण को!

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