बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

लक्ष्य निर्वाण !

चलते-चलते यदि 
रुक जाये पथिक 
तो लक्ष्य हो जाता 
क्यों और कठिन ?

पर गति ही तो है 
जो चेतन को देती 
नया अस्तित्त्व ,
और बनाती जीवंत !

लक्ष्य पूर्व ठहराव 
करता व्योमोहित 
और अंतस को 
कर देता भ्रमित !

बाधाएं और विराम ,
नहीं है लक्ष्य के 
कोई तुष्टि हेतु विकल्प !
और परिणाम !

चेतना ही चेतन को 
देगी इसका पूर्ण 
और शाश्वत लक्ष्य 
व अंतिम विराम !


हे अत्न होकर 
व्यथित और श्रांत 
न कर जीवन 
व्यर्थ और क्लांत !

तज न यह पथ
होकर कर्मच्युत
व्यर्थ न कर
लक्ष्य निर्वाण !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

अन्य पठनीय रचनाएँ!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...