शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

ये शब्द नहीं, यथार्थ हैं वर्तमान का और प्रत्यक्ष भविष्य !

क्षुधाकुल बालक की
कंठ अवरुद्द सिसकियाँ,
रोटी की जद्दोजहद में
टूटे हुए बदन का दर्द !
बंजर हुयी धरती की
अन्न्दायी वह कोख !
क्या यही है
मानव की महानतम
सभ्यता का चरम विकास !!


सूख गये बादल
सूरज शीतल हो गया ,
चाँद की तपिश
अब चुभने लगी बदन में !
नदी के चिह्न हैं
मात्र अवशेष ,
मौन हो चली जलधारा !!

हवा बंद है
एक सिलेंडर में
सांसें अब बिकने लगीं !
खरीदने को है
बेचैन अतिगव मानव ;
शायद भूल गया
वह प्रारब्ध के नियमों को !!

विकास की भूख ने
निगल लिया है
साधनों को;  अब
प्रायश्चित ही  शेष है
मिटाने को भूख,
 एवं प्रतीक्षा
 एक और सभ्यता के
 पतन की !!

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