सोमवार, 3 दिसंबर 2012

ऑक्टोपस


ऑक्टोपस;
सागर की तलहटी में,
या समाज की मुंडेर पर,
लीलते जलीय तुच्छ जन्तु
या जीते-जागते मानव का
पूरा-पूरा शरीर!


चूंस कर
उनकी रगों की रंगत,
व् निचोड़ कर
उसका मकरंद;

हमारे बीच,
हममें से ही
जाने कितने ऑक्टोपस
छिपे हुए
लपेटे चोला मानव का;

पहचानना होगा,
अंतर जानना होगा ,
हमें ऑक्टोपस से
मानव का !

10 टिप्‍पणियां:

  1. कितना ही प्रयास कर लें पर पहचानना बहुत मुश्किल होता है औक्टोपस का । सार्थक रचना

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  2. ऑक्टोपस हैं हर जगह, चूस रहें हैं खून।
    मानव बीच हरवक्त छुपे, अक्टूबर या जून ।।

    आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (05-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  3. वाह....
    बेहतरीन....
    आठ भुजाओं वाले मनुष्य से बचना होगा...

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .

    उत्तर देंहटाएं
  5. ओक्टोपस से आदमी की तुलना बहुत अच्छी लगी |बढ़िया रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. अस्थाना सर ,
    सादर प्रणाम |
    अपने बीच छुपे आक्टोपस को पहचानना तो बहुत ही जरूरी हैं |सार्थक लेखन |

    उत्तर देंहटाएं
  7. पहचानना होगा,
    अंतर जानना होगा ,
    हमें ऑक्टोपस से
    मानव का !
    बिल्‍कुल सही ...

    उत्तर देंहटाएं

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