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? क्यों और कब तक !

सदियों से,
हैवानियत
कर रही तांडव,
इंसानों की शक्ल में
बन कर हैवान !

और न जाने
कितनी ही "दमिनियाँ"
स्वाहा होती रहेंगी,
इस हैवान की
हवस में!


कब ये दमिनियाँ,
बनेंगी दावानल,
जो निगल जाएँगी
हैवानों की नस्ल;
हर हैवानियत पर
कुछ सहानुभूतियाँ,
क्या मिटा सकती हैं
यह हैवानियत ?

और,
क्या रोक पाएंगी
इन हैवानों को
फिर से किसी
दामिनी को
इस तरह
जिदगी और समाज से
लड़ते-लड़ते मर जाने से !

टिप्पणियाँ

  1. यही प्रश्न तो उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है ... पर क्या मिल पाएगा कभी सकारात्मक उत्तर ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. जो बात आपने कही है वे सब नेतायों के लिए "छोटी छोटी बातें बड़े शहरों में हुआ करती है" कह कर भूल जायेंगे :हम सलाम करते हैं निर्भय को -
    मेरी पोस्ट :निर्भय को श्रद्धांजलि

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्‍या लिखें मित्र..........? समझ में नहीं आता।

    उत्तर देंहटाएं
  4. जब ये दमिनियाँ, बनेंगी दावानल
    शायद तब...!

    उत्तर देंहटाएं
  5. और,
    क्या रोक पाएंगी
    इन हैवानों को
    फिर से किसी
    दामिनी को,,,,,,इसका इलाज सिर्फ सख्त क़ानून त्वरित न्याय मुझे लगता है,,

    recent post : नववर्ष की बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. 01/01/2013 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही है .... !!

    आपके सुझावों का स्वागत है .... !!
    धन्यवाद .... !

    उत्तर देंहटाएं
  7. कई दिनों से मैं ब्लॉग की दुनियां से कटा कटा रहा ... तो मैं आपकी पोस्ट पर नही आ पाया ...
    इस पर सहानुभूतियों से काम नहीं चलेगा ..ये जोश जो दिखा है बरकरार रखना पड़ेगा।

    यहाँ पर आपका इंतजार रहेगा: शहरे-हवस

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।