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देखूँगी मैं अभी उन्हें नयन भर....!


अभी-अभी 
तो वे गये हैं 
आने को कह कर,

अभी तो 
बीते हैं 
 कुछ ही बरस,
कुछ भी
तो नहीं 
हुआ है नीरस/
खुला ही 
रहने दो 
इस घर का यह दर.....!
अभी-अभी 
तो वे गये हैं 
आने को कह कर,

हर-
आहट  पर,
चौंक उठती,
रह-रह कर 
कहता 
क्षण
धीरज धर,
भ्रम से 
न मन भर ,
कहाँ
टूटी है
सावन की सब्र.....!
अभी-अभी 
तो वे गये हैं 
आने को कह कर,

अभी तो 
ऑंखें ही 
पथराई हैं,
कहाँ 
अंतिम घड़ी 
आयी है ,
अभी 
प्रलय की
घटा कहाँ  
छाई है, 

देखूँगी
मैं अभी 
उन्हें नयन भर....!

टिप्पणियाँ

  1. अभी तो

    आँखे ही
    पत्थराई है
    कहाँ अंतिम
    घड़ी आई हैं।

    वाह धीरेन्द्र जी .. किस कदर डूब कर लिखा हैं .. बहुत अच्छे
    आभार !!
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह----बहुत सही तर्कों को व्यक्त करती रचना-----बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "