मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

देखूँगी मैं अभी उन्हें नयन भर....!


अभी-अभी 
तो वे गये हैं 
आने को कह कर,

अभी तो 
बीते हैं 
 कुछ ही बरस,
कुछ भी
तो नहीं 
हुआ है नीरस/
खुला ही 
रहने दो 
इस घर का यह दर.....!
अभी-अभी 
तो वे गये हैं 
आने को कह कर,

हर-
आहट  पर,
चौंक उठती,
रह-रह कर 
कहता 
क्षण
धीरज धर,
भ्रम से 
न मन भर ,
कहाँ
टूटी है
सावन की सब्र.....!
अभी-अभी 
तो वे गये हैं 
आने को कह कर,

अभी तो 
ऑंखें ही 
पथराई हैं,
कहाँ 
अंतिम घड़ी 
आयी है ,
अभी 
प्रलय की
घटा कहाँ  
छाई है, 

देखूँगी
मैं अभी 
उन्हें नयन भर....!

6 टिप्‍पणियां:

  1. अभी तो

    आँखे ही
    पत्थराई है
    कहाँ अंतिम
    घड़ी आई हैं।

    वाह धीरेन्द्र जी .. किस कदर डूब कर लिखा हैं .. बहुत अच्छे
    आभार !!
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह----बहुत सही तर्कों को व्यक्त करती रचना-----बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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