गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

उड़ीसा के तंत्री

" कहने को मयस्सर हैं रोटियां,
पर कीमतें है यहाँ पर अलहदा ! "


एक तंत्री
अपनी पुरानी हस्त-तंत्री के
पास बैठा

कभी चूल्हे की ओर,
कभी हस्त-तंत्री पर,
उसकी झुर्रियों वाली
आँखें टिक जाती हैं!

कभी बुनता था
इन धागों से
अपनी जीविका और
जिन्दगी के दिन-रात,
हाँ " महाजन " के हजार रुपये
जो मजदूरी है
पांच तंत्रियों की
पूरे सात दिन की
भर देती है सूनी थाली
कुछ पलों के लिए !

" उड़ीसा के सोनपुर जिले में "कुस्टापाडा" के बुनकरों से बात करने के पश्चात !"


शब्दार्थ : हस्त -तंत्री= जुलाहे का करघा,
तंत्री= बुनकर !

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर. विचार भी, प्रवाह भी, शैली भी.

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  2. "कहने को मयस्सर हैं रोटियां
    पर कीमते है यहाँ पर अलहदा "

    बेहद सटीक व सच्ची बात है वीरे..


    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://rohitasghorela.blogspot.in/2012/12/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं
  3. गहन अनुभति और विचारनीय विषय पर सुन्दर अभिव्यक्ति .
    मेरी नई पोस्ट "पर्यावरण-एक वसीयत " हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों में.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहतरीन आज की मानवीय दशा जो की मानव द्वारा ही निर्मित हैं पर तीखा कटाक्ष

    उत्तर देंहटाएं

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