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संदेश

रिश्ते !

रिश्ते और उनके मायने न जाने कहाँ छूट गये ! सारी संवेदनाएं मात्र एक नाटक पात्र स दृश्य प्रदर्शित की जाती हैं ! मार्मिक दुर्घटनाओं पर आलेख, टिप्पणी पुस्तक रचना या या फिल्मांकन किया जा सकता है! परन्तु, इन संवेदनाओं से जुड़े कोमल तंतु जैसे रिश्तों के आयाम और मूल्य स्थापित करना , निरर्थक और विडम्बना पूर्ण हैं! पर अर्थ के उपार्जन हेतु  रिश्तो को बेंच देते है और उनका गला घोटने में भी कोई ग्लानि नही होती !

तुम कहाँ हो?

प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो?  मेरी कश्ती के किनारे, मेरे जीवन के सहारे; तन मन मेरे,    तुम कहाँ हो?  प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो?  मन के नूतन अभिनन्दन ! सुंदर जीवन के नवनंदन, प्राण धन मेरे,  तुम कहाँ हो?  प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो?  जीवन के नूतन अभिराम, मन मंदिर के प्रिय घनश्याम, प्रेम बंधन मेरे   तुम कहाँ हो?  प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो?  ढूढ़ते जिसे ये सूने नयन, पुकारे जिसे ये प्यासा मन; समर्पण मेरे,  तुम कहाँ हो?  प्रियवर तुम कहाँ हो?   तुम कहाँ हो? 

असत्य, अस्तित्त्व सत्य का

  असत्य ,  जिसने   बदला   इतिहास , जिसके   न   होने   पर   होता   है   सत्य   का   परिहास ! असत्य , न   रखते   हुए   अस्तित्त्व , करता   सत्य   को   साकार ; सत्य   का   जब   हुआ   उपहास , असत्य   से   ही   मिला   प्रभास ! किचित असत्य   नहीं    होता   यथार्थ !   परन्तु ,  सत्य   के   महत्त्व   का   आधार   है   यही   असत्य , हम   अब   भी   सत्य   औ   असत्य    के   महत्त्व   के   मध्य , हैं    विभ्रमित   और   विस्मित  ! इस   पार   है   असत्य  , उस   पार   वह   प्रत्यक्ष  , सत्य  !!

कर्मनाशाएं!

सागर को कर समर्पित सर्वस्व, सूख जाती हैं निस्त्राएँ; लेकिन इनका अस्तित्व, बनाये रखता है ससागर को; पर कभी-कभी कुछ निस्त्राएँ; जो होती हैं पवित्र और निर्मल बन जाती हैं , छोटी- बड़ी कर्मनाशाएं! जिनकी हारें कभी-कभी हो जाया करती हैं असम्भव! *************************** निस्त्राएँ=नदियाँ !

स्त्रीत्व : समर्पण का छद्म पूर्ण सम्मान !

सुलगती आहों का , समन्दर लेकर वह; जीती है जिन्दगी ! उसकी सर्द आहों की तपिश झुलसा रही है; सारे बदन को ! अंग-अंग हो चुका है घायल; उसके अपनों के दिए हुए जख्मों से ! फिर भी वह, जिए जा रही है पीकर वेदना की लाल शिखाएं! यातनाओं के सारे आयाम पीछे छोड़ते हुए, बस जीना ही जीना सीखा है उसने! कभी-कभी सोंचती है; कर दे बगावत, नहीं चाहिए उसको अब कोई मिथ्या अस्तित्व ! और अभी तक उसके अस्तित्व के जो मिथ्या प्रतिमान हैं भी वह कितने सार्थक? नहीं अब मिटा देगी; अपना यह मिथ्या अस्तित्व और नहीं, चाहिए त्याग और समर्पण का छद्म पूर्ण सम्मान !

स्त्री !

चाणक्य ! तुमने कितनी , सहजता से कर दिया था; एक स्त्री की जीविका का विभाजन ! पर, तुम भूल गये! या तुम्हारे स्वार्थी पुरुष ने उसकी आवश्यकताओं और आकाँक्षाओं को नहीं देखा था! तुम्हें तनिक भी, उसका विचार नही आया; दिन - रात सब उसके तुमने अपने हिस्से कर लिए! और उसका एक पल भी नहीं छोड़ा उसके स्वयं के जीवन जीने के लिए!

टूट कर जो न बिखरे वो शख्सियत है,

टूट कर जो न बिखरे वो शख्सियत है, वरना जमाने में कमी नहीं आदमी की ! गिर कर जो फिर सम्भल जाय ठोकरों से, देता है जमाना मिसाल उस आदमी की ! हर एक गम में जो मुस्कराता रहे सदा, पूरी होती तमन्ना-ए-जिन्दगी उस आदमी की ! हालतों से लड़ जीत लेता है जो जंग-ए- जिन्दगी, आसाँ हो जाती है राह -ए-मंजिल उस आदमी की ! जो बनता है मुकद्दर मिटाकर खुद की हस्ती को, और भी संवर जाती है जिन्दगी उस आदमी की ! टूट कर जो न बिखरे वो शख्सियत  है, वरना जमाने में कमी नहीं आदमी की !