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टूट कर जो न बिखरे वो शख्सियत है,


टूट कर जो न बिखरे वो शख्सियत है,
वरना जमाने में कमी नहीं आदमी की !

गिर कर जो फिर सम्भल जाय ठोकरों से,
देता है जमाना मिसाल उस आदमी की !

हर एक गम में जो मुस्कराता रहे सदा,
पूरी होती तमन्ना-ए-जिन्दगी उस आदमी की !

हालतों से लड़ जीत लेता है जो जंग-ए- जिन्दगी,
आसाँ हो जाती है राह -ए-मंजिल उस आदमी की !

जो बनता है मुकद्दर मिटाकर खुद की हस्ती को,
और भी संवर जाती है जिन्दगी उस आदमी की !

टूट कर जो न बिखरे वो शख्सियत  है,
वरना जमाने में कमी नहीं आदमी की !

टिप्पणियाँ

  1. सच है आदमी हर कठिनाई से मुक़ाबला कर सकता है ....

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  2. हर दर्द सीने में छिपा लेते है ,हर शख्स को अपना बना लेते हैं ,शानदार पोस्ट ,बधाई |आपके ब्लॉग पर आना सार्थक हुआ|

    उत्तर देंहटाएं
  3. जीवन के विविध प्रसंगों को समेटे आपकी रचना सार्थक है ...!

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह...
    शानदार अभिव्यक्ति...!!

    कुछ ऐसे भी इंसान होते हैं...
    दर्द सीने में छुपा लेते हैं...!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बढ़िया....
    सार्थक भाव लिए गज़ल...
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 24/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर भाव लिए सार्थक रचना...
    बहुत खूब....
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहद प्रभावशाली रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. सच बात है ...
    बढ़िया सम्प्रेषण!
    शुभकामनायें आपको !

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "