गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012

गम-ए- पुरसिसी का आलम न पूँछिये,

गम-ए- पुरसिसी का आलम न पूँछिये,
सब आये हँसने मेरे हालात पर !


ये कोई अदालत नहीं है गुनाह-ए- इश्क की,
जो हो रहे हैं सवाल-सवालात पर !


इल्ज़ामों से बेहतर खामोश रहना ठीक,
लगा लिए हैं ताले जज़्बात पर !


ऐ बंदे! किसने दिया है तुमको ये हक,
लगाओ कोई इल्ज़ाम कायनात पर !


वो कफ़न साथ लाये थे, न थी उन्हें कोई;
शक-ओ-शुबा उनके इन्तजामात पर !


गम-ए- पुरसिसी का आलम न पूँछिये,
सब आये हँसने मेरे हालात पर !

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...
    लाजवाब गज़ल....
    सभी शेर कमाल के है...

    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया ग़ज़ल है | बहुत खूब |

    मेरे ब्लॉग में आये और हमसे जुड़ें |
    जवाब नहीं मिलता

    उत्तर देंहटाएं
  3. कल 21/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  4. गम-ए- पुरसिसी का आलम न पूँछिये,
    सब आये हँसने मेरे हालात पर !

    इल्ज़ामों से बेहतर खामोश रहना ठीक,
    लगा लिए हैं ताले जज़्बात पर !

    ये कोई अदालत नहीं है गुनाह-ए- इश्क की,
    जो हो रहे हैं सवाल-सवालात पर !
    सुंदर भाव एक नजर इधर भी... http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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