गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012

पतिता

जिश्म को बेंच कर,
वह पालती उदर;
पतिता कहाती वह,
पर क्या वह पतिता ही है?
क्यों,कैसे पतित हुयी,
सहयोग तुम्हारा भी तो है!
बनाने को पतिता,
तुमने ही विवश किया;
फिर उसको यह नाम दिया ,


चंद चंडी के टुकड़े,
बनाते मिटाते 
उसके अस्तित्व को 
तुम्हारी भूख में 
वह सेंकती रोटियां;
भूख मिटाने को
वह लुटाती नारीत्व  
नारी बचाने को/

वासना भरी आँखें ही 
हर तरफ दिखीं,
घर - परिवार
और समाज 
सब बहसी लगें
कहाँ जाय 
किस-किस से बचे
हर तरफ दरिंदगी दिखे!

पर करती जो
समाज को पतित;
क्या वो पतिता ही
कहलाती हैं?
आज भी लज्जित होता
 समाज उनसे,
फिरभी सभ्यता की भीड़ में 
वो सभी ही 
कही जाती हैं!!


11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन

    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  2. कल 07/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सार्थकता लिये सशक्‍त अभिव्‍यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर भाव। पढ़कर मन त्रिप्त हो गया कभी मेरे ब्लौग http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com पर भीआना अच्छा लगेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सार्थक रचना ....सोचने को विवश करती है

    उत्तर देंहटाएं
  6. शौक से तो कौई शरीर नही बेचता । पेट की आग अपनी और बच्चों की बुझाने के लिये चाहिये चांदी के चंद सिक्के जो खरीद सके रोटी ।
    कडवा सच कहती रचना ।

    उत्तर देंहटाएं

अन्य पठनीय रचनाएँ!

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...