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पतिता

जिश्म को बेंच कर,
वह पालती उदर;
पतिता कहाती वह,
पर क्या वह पतिता ही है?
क्यों,कैसे पतित हुयी,
सहयोग तुम्हारा भी तो है!
बनाने को पतिता,
तुमने ही विवश किया;
फिर उसको यह नाम दिया ,


चंद चंडी के टुकड़े,
बनाते मिटाते 
उसके अस्तित्व को 
तुम्हारी भूख में 
वह सेंकती रोटियां;
भूख मिटाने को
वह लुटाती नारीत्व  
नारी बचाने को/

वासना भरी आँखें ही 
हर तरफ दिखीं,
घर - परिवार
और समाज 
सब बहसी लगें
कहाँ जाय 
किस-किस से बचे
हर तरफ दरिंदगी दिखे!

पर करती जो
समाज को पतित;
क्या वो पतिता ही
कहलाती हैं?
आज भी लज्जित होता
 समाज उनसे,
फिरभी सभ्यता की भीड़ में 
वो सभी ही 
कही जाती हैं!!


टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन

    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  2. कल 07/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सार्थकता लिये सशक्‍त अभिव्‍यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर भाव। पढ़कर मन त्रिप्त हो गया कभी मेरे ब्लौग http://www.kuldeepkikavita.blogspot.com पर भीआना अच्छा लगेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सार्थक रचना ....सोचने को विवश करती है

    उत्तर देंहटाएं
  6. शौक से तो कौई शरीर नही बेचता । पेट की आग अपनी और बच्चों की बुझाने के लिये चाहिये चांदी के चंद सिक्के जो खरीद सके रोटी ।
    कडवा सच कहती रचना ।

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "