शुक्रवार, 16 मार्च 2012

जीवन रहस्य !

बना कर बंधन ,
कर दिया संकुचित
जीवन को!
फिर करते आशा
एक स्वतंत्र
जीवन यापन की

भाग्य, भगवान
धर्म, पाप और पुन्य
जैसे भयानक
बन्धनों से बांध कर!
और बनाकर कुछ
वर्जनाएं और यातना,
कर देते निष्प्राण
स्वयंभू जीवन को !

पर  जीवन तो
स्वतंत्र होकर ही
हो सकता है सार्थक,
जो स्वयं के लक्ष्य को
जानकर ,
कर सकता है प्राप्त !

लेकिन सदियों में कभी
कोई जीवन शायद ही
जी पाया हो और
प्राप्त कर लिया हो
उस चिर रहस्य के
गह्वर सूत्रों को ,
और हो गया हो
सिद्धार्थ उसका जीवन !!

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