रविवार, 25 मार्च 2012

"धरती का जीवन"

नदी के कूल में,
करती अठखेलियाँ ;
जाने कहाँ लीन हो गईं
वो अल्लढ उर्मियाँ !


पूनम के चाँद की
वो शीतल चांदनी
रात रानी की
मादक महक ;
पपीहा का चिर
'पी कहाँ ' का स्वर ,
न जाने कहाँ
विलीन हो गया !

सिक्के ढालने वाले
कल कारखानों का
कर्ण विदारक शोर;
और इनसे विसर्जित
विषैला रसायन;
जीवन को कर
अशांत और विषाक्त !
कर दिया रिक्त और
सिक्त निस्त्रा को;


धूमिल हो गयी धुएं से
वो चांदनी रातें और
उजड़ गये धरती का
शृंगार करने वाले;
उपवन और नभचर !
कितना हो गया परिवर्तित
इस धरती का जीवन!


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