शुक्रवार, 30 मार्च 2012

जबसे तेरा अस्क मुझमें दिखने लगा है !

अब मुझे आईने से डर लगने लगा है ,
जबसे तेरा अक्स  मुझमें दिखने लगा है !


अक्सर मेरे ख़याल मुझसे ये सवाल करते हैं ,
इधर तू कुछ बदला-बदला दिखने लगा है !

इक मुद्दत हुयी खुद को भूले हुए मुझे,
अब तो जर्रे-जर्रे में तू ही तू दिखने लगा है !

गम-ए- दर्द का इल्म ही न रहा दिल को ,
जबसे तेरे अश्कों में आबे- हयात दिखने लगा है !

कहाँ है खुदा और किसे करूं सजदा यहाँ,
अबतो मेरे अजीज में ही खुदा दिखने लगा है !


अब मुझे आईने से डर लगने लगा है ,
जबसे तेरा अस्क मुझमें दिखने लगा है !

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