सोमवार, 19 मार्च 2012

परतन्त्रता !

उड़ते हुए 
पक्षियों को देख कर !
सोंचता हूँ क्यों नहीं 
मिले मुझे भी ये पर !

नाप लेता मै भी ,
अनंत आकाश की
विशाल सीमा को !
और लिख देता
अतृप्त अभिलाषा का
सम्पूर्ण इतिहास !


पर डर जाता हूँ,
जब निरीह पक्षियों को
देखता हूँ पिजड़ों में
असहाय और बेबस !
फिर सोंचता हूँ
कि ये मानव अच्छे हैं
या कि ये बेचारे पक्षी !

नहीं कोई भी
संतुष्ट और स्वतंत्र नहीं है ,
पक्षियों से भी ज्यादा
परतंत्र हैं कुछ मानव !
जो सहते हैं मात्र औ
मात्र अत्याचार !

न उन्हें उड़ने की
स्वतन्त्रता है
न ही उनके पास
एक पिजड़े जैसा
घर और छोटी
कटोरियों में खाना,
और पीने का पानी !





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