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संदेश

शेष

तुम नही हो  तो भी तुम  मेरे अंदर हो, सब कुछ लेकर  चले गये पर  कुछ शेष रहा  मेरे अंदर तुम्हारा  उस शेष को  न लेजा सके तुम  क्योंकि वह शेष  मेरा नहीं तुम्हारा था ! तुम्हारा होना या न होना  नहीं महसूसता अब  और यह शेष तुम्हारे  अस्तित्व की स्मृति नहीं मिटने देता है !

भिक्षुक

लड़खड़ाते   कदमों से, लिपटा हुआ चिथड़ों से, दुर्बल तन, शिथिल मन; लिए हाँथ में भिक्षा का प्याला ! वह देखो भिक्षुक सभय, पथ पर चला आ रहा है/ क्षुधा सालती उदर को, भटक रहा वह दर-दर को, सभ्य समाज का वह बिम्ब; जिसमें उसने जीवन ढाला, खोकर मान-अभिमान, पथ पर चला आ रहा है/ हर प्राणी लगता दानी , पर कौन सुने उसकी कहानी, तिरिष्कार व घृणा से, जिसने  है उदर को पला ; घुट-घुट कर जीता जीवन, पथ पर चला जा  रहा है/ हाँथ पसारे, दाँत दिखाए, राम रहीम की याद दिलाये; मन को देता  ढा ढस; मुख पर डाले ताला, लिए  निकम्मा का कलंक, पथ पर चला जा  रहा है/

पानी वाला घर :

समूह में विलाप करती स्त्रियों का स्‍वर भले ही एक है उनका रोना एक नहीं... रो रही होती है स्‍त्री अपनी-अपनी वजह से सामूहिक बहाने पर.... कि रोना जो उसने बड़े धैर्य से बचाए रखा, समेटकर रखा अपने तईं... कितने ही मौकों का, इस मौके के लिए...।  बेमौका नहीं रोती स्‍त्री.... मौके तलाशकर रोती है धु्आं हो कि छौंक की तीखी गंध...या स्‍नानघर का टपकता नल...। पानियों से बनी है स्‍त्री बर्फ हो जाए कि भाप पानी बना रहता है भीतर स्‍त्री पानी का घर है और घर स्‍त्री की सीमा....। स्‍त्री पानी को बेघर नहीं कर सकती पानी घर बदलता नहीं....। विलाप.... नदी का किनारों तक आकर लौट जाना है तटबंधों पर लगे मेले बांध लेते हैं उसे याद दिलाते हैं कि- उसका बहना एक उत्‍सव है उसका होना एक मंगल नदी को नदी में ही रहना है पानी को घर में रहना है और घर बंधा रहता है स्‍त्री के होने तक...। घर का आंगन सीमाएं तोड़कर नहीं जाता गली में.... गली नहीं आती कभी पलकों के द्वार हठात खोलकर आंगन तक...। घुटन को न कह पाने की घुटन उसका अतिरिक्‍त हिस्‍सा है... स्‍त्री गली में झांकती है, गलियां सब आखिरी सिरे पर बन्‍द हैं....। ....गली की उस ओ...

मुझे तुम रहने दो यूँ ही मौन !

मुझे तुम  रहने दो  यूँ ही मौन ! कितने प्रश्न  हैं भीतर मेरे, सब तोड़ दिए  वो किये हुए  अनुबंध मेरे तेरे ! किस आधार पर  निराधार करेगा  ये अपराध सारे ! है बेहतर  मेरा मौन ही  रह जाना ! किसको किसने  कबतक किसका  है माना !! फिर सोंच यह  उठता है मन मेरे , किस जीवन में  कितनी हैं  शामें और  कितने है सवेरे !! मुझे तुम  रहने दो  यूँ ही मौन ! कितने प्रश्न  हैं भीतर मेरे, मुझे तुम  रहने दो  यूँ ही मौन ! कितने प्रश्न  हैं भीतर मेरे,

एक और दिन

सुबह की  शबनमी घास  या पक्षियों का कलरव, अधखिली कलियों के  खिलने की आतुरता  सब लीन हो जाते हैं  एक और दिन गुजरने के  प्रयास में ! और फिर  सूरज ओढ़ लेता है  वही चिर पुरानी  तमिषा की चादर, शाम होने तक  कहीं रात उसके  गुनाहों का  हिसाब न मांगने लगे !

धर्म हठ

मैंने भी बादल की  एक बूँद  के इन्तजार में; बिताया है पूरा एक बरस ! फिर मन मार कर धरती की छाती में  धँसा दिया  नुकीला हल ! क्योंकि  मुझे तो निभाना ही था, एक किसान का धर्म ; भले ही नष्ट हो जाय  एक और सभ्यता  अपने विकास के  चरमोत्कर्ष  परिणामों से !

१५ अगस्त -२०१३ : एक और कैलेंडर !

अभी कल ही लगा था कि देश आजाद हो गया है ! भले ही दो टुकड़े  होने के बाद  और "ग़दर" या  'शरणार्थियों' की बदत्तर हालातों से परे, देश ने भी महसूसा था  आज़ादी पन को ! धीरे-धीरे  बीत गये छियासठ बरस चमकती आँखों की  शून्यता में वो सरे  सपने ,  लोकतंत्र की राजनीति की  भेंट चढ़ गये ! अब राजनेता  या  'कार्पोरेट' ही मनाते हैं  आज़ादी का उल्लास! और  किसान का बच्चा  अब भी खड़ा है'  सर झुकाए  यस सर या  हाँ, मालिक ! एक सिवा  उसे नहीं है  आज़ादी बिसलेरी के बचे हुए पानी को  भी पीने की ! ४७ से १३ तक  कुछ बदला है तो  बस एक  "कैलेंडर"