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ग्लानि

क्षण भर के जीवन में हे मानव!
तू क्यों मानवता से विमुख हुआ?
करता निज बन्धु पर आघात;
क्षुण धन हेतु पतनोन्मुख हुआ!

लोभ-मोह-माया से होकर ग्रसित;
जीवन में तू लक्ष्य विहीन हुआ !
खोकर निज अस्मिता को मानव,
स्व पतन से तू दैन्य-दीन हुआ !!

पाखंड-झूठ अन्याय में लिप्त हो;
निज गौरव हानि से न म्लानि हुयी!
मानवता पर करते अत्याचार,
मानव तुझे तनिक ण ग्लानि हुयी !!

जननी-जन्मभूमि पर कर रहा;
तू नित-नित भीषण अत्याचार!
कर रही आज मानवता कृन्दन,
देख मानव का निर्लज्ज व्यवहार !!

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बेख्याली

न जाने किस ख्याल से बेख्याली जायेगी; जाते - जाते ये शाम भी खाली जायेगी। गर उनके आने की उम्मीद बची है अब भी, फिर और कुछ दिन  मौत भी टाली जायेगी। कुछ तो मजाज बदलने दो मौसमों का अभी, पुरजोर हसरत भी दिल की निकाली जायेगी। कनारा तो कर लें इस जहाँ से ओ जानेजां, फिर भी ये जुस्तजू हमसे न टाली जायेगी । कि ख्वाहिश है तुमसे उम्र भर की साथ रहने को, दिये न जल पाये तो फिर ये दिवाली  जायेगी।

मतलब का मतलब......

 मतलब की दुनिया है-जानते सभी हैं, फिर भी यहाँ मतलब निकालते सभी हैं। अपनापन एक दिखावा भर है फिर भी, जाहिर भले हो लेकिन जताते सभी हैं। झूठी शान -ओ-शौकत चंद लम्हों की है, ये जानते हुए भी दिखाते सभी हैं। नहीं रहेगी ये दौलत सदा किसी की,  जमाने में पाकर इठलाते सभी हैं। मौत है मुत्मइन इक न इक दिन आएगी, न जाने क्यूँ मातम मनाते सभी हैं।

क्या हूँ मैं?

मुझे वो पढ़ता रहा  गढ़ता रहा  कभी एलोरा की गुफाओं , कभी पिकासो की मनः स्थितियों में! लेकिन  कभी वो नहीं  बदल सका  अपनी संकुचित  और शंकालु  प्रवृत्ति  और  डसने को  तत्पर रहता है हर क्षण ! और आज तक मैं अनभिज्ञ   ही रही  मेरा  अस्तित्व  और मैं क्या हूँ  इस पुरुष प्रवृत्ति  के लिए !   ?