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त्राण

व्यथित है तू मन की व्यथा से;
अतृप्त है तू आशा की तृष्णा से!
कर्तव्य अधिकार की चिंता में;
व्यथित है तू जीवन मृश्ना से !!

उलझ गया जीवन के  प्रश्नों से;
विक्षिप्त हुआ पथ के अश्नों से!
माया-ममता से है व्योमोहित;
"मैं" के मिथ्या अहम् से है गर्वित !!

लेना ही लेना है तेरा लक्ष्य;
नहीं भावना है समर्पण की !
व्यर्थ तू मानवता का प्रहरी;
व्यर्थ है भाषा कर्म-अर्पण की!!

कृतिका से चाहते हो निवृत्ति;
धरो धरित्री सा  धीरज तुम;
मत मुख मोड़ो देख विवृत्ति 
कर दो सर्वस्व अर्पण तुम!

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है बस लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. मदन मोहन जी बहुत आभार जो आप ने मेरे चिट्ठे का अवलोकन किया !
      भविष्य में ऐसी ही कृपा का आकांक्षी रहूँगा!

      धन्यवाद!

      हटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "