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अप्लाषिका

पुष्प में खोजता गंध-पराग;
अवयव में खोजता जीवन राग!
मृगमरीचिका में शीतल प्यास,
कृतिका में कहाँ जीवन विश्वास!!

पूषा तप्त अवनि पर कहीं जो,
चिर शीतल-शांत छाँव मिले;
झंझा से उजड़े नीड़ विहाग को,
क्षण भर का ठहराव मिले!

महा काल के काल प्रभंजन में,
क्या कुछ अक्षुण रह पाया है?
कौन दुस्तर जीवन पथ पर,
तीक्ष्ण झोंके झंझा के सह पाया है?

प्रलय पूर्व जो था शेष;
शेष रहेगा प्रलय पश्चात!
यह तो है व्यर्थ व्योमोह,
है निर्वाण ही पूर्ण साक्षात्!!

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "