रविवार, 26 अगस्त 2012

अप्लाषिका

पुष्प में खोजता गंध-पराग;
अवयव में खोजता जीवन राग!
मृगमरीचिका में शीतल प्यास,
कृतिका में कहाँ जीवन विश्वास!!

पूषा तप्त अवनि पर कहीं जो,
चिर शीतल-शांत छाँव मिले;
झंझा से उजड़े नीड़ विहाग को,
क्षण भर का ठहराव मिले!

महा काल के काल प्रभंजन में,
क्या कुछ अक्षुण रह पाया है?
कौन दुस्तर जीवन पथ पर,
तीक्ष्ण झोंके झंझा के सह पाया है?

प्रलय पूर्व जो था शेष;
शेष रहेगा प्रलय पश्चात!
यह तो है व्यर्थ व्योमोह,
है निर्वाण ही पूर्ण साक्षात्!!

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