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व्योमोहन: जीवन का

दूर तक;
न अत्न का प्रकाश
न राग की किरण!

पूर्ण भू पर
निशा का प्रभास;
न आशा की किरण!

व्योमोहित
गति मंद
व्यथित अंतर्मन!

आक्रांत उर
मति कुंद,
श्रांत विच्छिप्त तन !

न भविष्य का 
पथ आलोकित;
न जीवन का आधार!

न उर में उमंग;
अपुल्कित मन,
न कोई कर्म आभार!

न कोई लक्ष्य;
जीवन में न विश्वास!
अर्थ हीन श्रम;
निष्प्राण- निः श्वास !

टिप्पणियाँ

  1. न कोई लक्ष्य;
    जीवन में न विश्वास!
    अर्थ हीन श्रम;
    निष्प्राण- निः श्वास !

    बहुत खूब सर!

    सादर

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।