सोमवार, 20 अगस्त 2012

प्रकृति का विघटन


चल रही धरा पर विध्वंश की कुल्हाड़ी,
प्रकृति की देखो आज उजड़ रही फुलवाड़ी !

मानव कर रहा नित नव अनुसन्धान;
नाभकीय विखंडन हो या अंतरिक्ष उड़ान!

हो रही दूषित गौरव मयी गंगा पावन,
विटप- विहग और वनचरों का हो रहा हनन !

चिर सौन्दर्य की चाह में व्यर्थ हो रहे प्रयोग;
भौतिक विलास की चाह में लग रहे उद्योग !

धरा को शृंगार हीन कर, हो रहा निष्ठुर मानव;
लिए जा रहा रसातल को बन हिरण्याक्ष दानव!

प्रकृति के क्षरण से क्या होंगे परिणाम भयंकर;
शरणागती था तू और बन गया स्वयं क्षयंकर !

क्षुधा पूर्ति हेतु हो रहा जीवों का क्रथन;
देख क्रूरता सुतों की कर रही धरा रुदन !

चल रही आंधियां हो रहे भीषण प्रहार;
विनाश हेतु बन रहे नित नव आयुधागार !

भूकंप हो या दैवी आपदाएं, ले रही निज प्रतिशोध;
प्रकृति की कृति का जब-जब मानव करता प्रतिरोध!

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