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प्रकृति का विघटन


चल रही धरा पर विध्वंश की कुल्हाड़ी,
प्रकृति की देखो आज उजड़ रही फुलवाड़ी !

मानव कर रहा नित नव अनुसन्धान;
नाभकीय विखंडन हो या अंतरिक्ष उड़ान!

हो रही दूषित गौरव मयी गंगा पावन,
विटप- विहग और वनचरों का हो रहा हनन !

चिर सौन्दर्य की चाह में व्यर्थ हो रहे प्रयोग;
भौतिक विलास की चाह में लग रहे उद्योग !

धरा को शृंगार हीन कर, हो रहा निष्ठुर मानव;
लिए जा रहा रसातल को बन हिरण्याक्ष दानव!

प्रकृति के क्षरण से क्या होंगे परिणाम भयंकर;
शरणागती था तू और बन गया स्वयं क्षयंकर !

क्षुधा पूर्ति हेतु हो रहा जीवों का क्रथन;
देख क्रूरता सुतों की कर रही धरा रुदन !

चल रही आंधियां हो रहे भीषण प्रहार;
विनाश हेतु बन रहे नित नव आयुधागार !

भूकंप हो या दैवी आपदाएं, ले रही निज प्रतिशोध;
प्रकृति की कृति का जब-जब मानव करता प्रतिरोध!

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "