बुधवार, 15 अगस्त 2012

बेवक्त किस्मत कोई मंजर दिखाती नहीं!

क्या अफ़सोस कि याद उनकी जाती नहीं;
बेवक्त किस्मत कोई मंजर दिखाती नहीं!

अब तो खलिश ही बाकि रही शब-ए-हिजराँ;
जिन्दगी हिजरात की वजह बताती नहीं!

बजीच-ए-अल्फात समझते थे मोहब्बत को,
दास्ताँ-ए-हश्र जेहन से भुलाई जाती नहीं !

आना होगा उसे जब, वो आ ही जाएगी,
मौत यूँ ही कमबख्त बेवक्त आती नहीं !

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