सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्षुधा

क्षुधाकुल होकर जब;
भोजन हेतु लड़ना पड़ता है,
जीवन के अश्मर पथ पर
जब प्रस्तर बनाना पड़ता है!
गीता का दर्शन, गाँधी का सत्य;
बुद्ध की अहिंसा पीछे छूट जाती है!
जब फावड़ा और कुदाल संग,
जेठ की तपिश में कमर टूट जाती है!
न  गौरव  गरिमा का ध्यान,
न अस्मिता जाने पर ग्लानि होती है!
उदराग्नि की शांति हेतु;
अमानुषिकता पर न म्लानि होती है!!
इस नीरस प्राण हेतु मानव;
जब स्व सुता का मोल लगाता है!
मानवता तृण-तृण हो जाती है,
जब नारी को क्षुण धन से तोला जाता है

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "