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आज फूलों को ही आंधियों से टकराना होगा!

आज फूलों को ही आंधियों से टकराना होगा!
          लाख तूफाँ कोशिश करले;
          विनाश की हदें पार कर ले,
          बवंडर कितना ही तीव्र हो;
आज कश्ती को भीच भंवर पार जाना होगा !
आज फूलों को ही आंधियों से टकराना होगा!

          सदियाँ गुजर गईं विध्वंस में;
          खिंच गईं तलवारें वंश-वंश में,
           कर्म गीता का पढकर पाठ;
अर्जुन को 'भारत' का इतिहास दोहराना होगा !
आज फूलों को ही आंधियों से टकराना होगा!

         एक बार फिर आग दो मशाल को;
         क्रांति पर्व में चढ़ा दो निज भाल को,
         परिवर्तन है चिर नियम प्रकृति का;
सृजन के पथ पर वीरों को कदम बढ़ाना होगा !
आज फूलों को ही आंधियों से टकराना होगा! 

टिप्पणियाँ

  1. कल 19/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच कहा ....जब तक कमजोर अपनी ताकत नहीं पहचानेगा .....कुछ नहीं होगा .....बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बेहतरीन
    प्रेरित करती रचना....
    :-)

    उत्तर देंहटाएं

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छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

इंतजार, इंतजार करो

तुम्हें याद होगा!
नीली रोशनी में
काँपते हुए  
नीले होंठों से कहा था-
"--------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
सावन की हल्की  फुहारों में
सकुचाते ह्रदय से कहा था- 
"------------------!" 

तुम्हें याद होगा! 
अंगीठी के पास
लाल सुर्ख चेहरे  से 
शर्माते हुए कहा था- 
"----------------!" 

और यह कहती हुई 
मुझे तनहाई में  
सन्नाटे देकर चली गयी- 
" इंतजार, इंतजार करो ! "