सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ग्लानि

क्षण भर के जीवन में हे मानव!
तू क्यों मानवता से विमुख हुआ?
करता निज बन्धु पर आघात;
क्षुण धन हेतु पतनोन्मुख हुआ!

लोभ-मोह-माया से होकर ग्रसित;
जीवन में तू लक्ष्य विहीन हुआ !
खोकर निज अस्मिता को मानव,
स्व पतन से तू दैन्य-दीन हुआ !!

पाखंड-झूठ अन्याय में लिप्त हो;
निज गौरव हानि से न म्लानि हुयी!
मानवता पर करते अत्याचार,
मानव तुझे तनिक ण ग्लानि हुयी !!

जननी-जन्मभूमि पर कर रहा;
तू नित-नित भीषण अत्याचार!
कर रही आज मानवता कृन्दन,
देख मानव का निर्लज्ज व्यवहार !!

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

छूटे हुए पल

कहीं कुछ छूट जाता है
जब न समेट पाने की वजह से नहीं,
बल्कि जानबूझकर
छोड़ दिया जाता है;
वह कचोटता रहता है उम्रभर।

छोड़े जाने की
कोई तो वजह रही होगी
या रही होगी मजबूरी,
जब हमने छोड़ दिया;
उस छूटे हुए पल को,
जिसे उम्र आज भी 
आकुल है पा लेने को।
काश.....................

यादें: जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी।

जज़्बातों को
तुम समेट लेना,
मैं रख लूँगा
तुम्हारा मन। कि बिखरने न पाये
सबंधों की गठरी
और हाँ,
बोझ भी न बनने पाये।
बना रहे
जीवन में हल्कापन।। क्यों
समय से पहले
टूट जाती हैं
ये ख्वाहिशें, या
हो जाती हैं पैदा
नयी ख्वाहिशें,
पूरी होने पर।
क्या यही है जीवन।। तुम्हारी अँगुलियों में,
लिपटा हुआ
मेरे केशों का
बिखरा हुआ प्रेम।
समेट रहा हूँ
शामों को यादों में
भीग रहा है हमारा मन।।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।

तुम क्या मुकम्मल करोगे मसलों को,
तुम्हें ही तुम्हारा जवाब मुबारक।

हो सकते थे और बेहतर हालात,
रख लो, तुम्हें तुम्हारा हिसाब मुबारक ।

सूरत बदलने से नहीं बदलती सीरत,
तुमको ये तुम्हारा नया हिजाब मुबारक।

खुद ही खुद तुम खुदा बन बैठे हो
तुम्हें यह तुम्हारा खिताब मुबारक।

तुम्हें तुम्हारा आफताब मुबारक
हमको हमारा ये चराग मुबारक।